ग़लत फ़हमी

ड्रॉइंग रूम में सजी मूरत
जो किसी कारीगर की
नायाब कारीगरी थी
जिसे मजबूर हो कर
बेचा था उसने
आज वो मेरी है

धूल से लथपथ
अपने गले पर
अपनी क़ीमत लटकाए
जो कभी दुकान के कोने में
बेज़ुबान पड़ी थी
आज वो मेरी है

मोल देकर ख़रीदा है
मालिक बदल गया है
ना पूछा इस बेज़ुबान से
ना ज़रूरत समझी
किसी और की ज़िंदगी का हिस्सा थी
आज वो मेरी है

मेरा उस पर हक़ है
किसी और का नहीं
ना रचने वाले का,
ना रखने वाले का
ये मेरी सोच है, मेरा यक़ीन है
ये ग़लत फ़हमी उन सब की थी
आज वो मेरी है

Who does it belong to (कौन है मालिक)

ड्रॉइंग रूम में सजी हर चीज़

जो किसी कारीगर की

नायाब कारीगरी थी

जिसे मजबूर हो कर

बेचा गया था

जो कभी दुकान के कोने में

धूल से लथपथ

अपने गले में

अपनी क़ीमत लटकाए

बेज़ुबान पड़े थे

आज मेरे घर की रौनक़ है

मोल दिया है

अब वो सब मेरे हैं

शायद ये एहसास

उन चीजों को भी होगा

ऐसी मेरी सोच है

ऐसा मेरा यक़ीन है

ऐसा मेरा भ्रम है

I still don’t win

It’s cold and windy

My body lays bare

The nature pitted against me

It’s not even fair

I close my eyes

And I am still

The wind passes me by

I feel no chill

In this battle with nature

I still don’t win

Because it’s not out there

It’s there within

Beyond Myself

I started to move

The motive was clearer

Sped up

tried to catch up

The thrill was fun

I stepped on the pedal

Crushed it to the floor

like a ravenous hungry beast

The nozzle sucked the gas

I accelerated

Faster and faster

Wind gushing through the hair

Flapping the shirt

In a mad frenzy

Shrieking wind cried

In a weird urgent way

Faster and faster

Wild and driven

Till it was all behind

Till it was all quiet

Till it was all still

Sublime

Blissfully

I had gone

Beyond me

Aaj bhi vaisa hi

इन उँगलियों पे लिपटी

वो हसरत भरे नरम हाथ

मासूम नज़रों से ताकती

वो नज़र और वो एहसास

आज भी वैसे ही है

दौड़ के सीने से लगना

खुश हो कर कंधो पर झूल जाना

हर आप बीती बयान करना

वो चुलबुली सी बातें

आज भी वैसे ही हैं

उस शरारती कोने में छिपा हुआ

वो क़िस्सा आज भी महफ़ूज़ है

वो ग़ुस्ताख़ पर्चे और ख़ाली ख़त के पन्ने

वो किताबों में छुपे सूखे फूल

आज भी वैसे ही हैं

स्कूल की वैन में बैठे

भरी आँखों से पलट कर देखना

मेरा लपक कर उसे बाहों में भर लेना

वो झिझक और वो भीगे नैन

आज भी वैसे ही हैं

पर आज रोक ना पाया,

अपना रास्ता खुद चुन रही है

बड़ी जो हो गयी है वो

पर मेरी नज़र में आज भी

वो नज़र और वो एहसास

आज भी वैसे ही है

Let’s shuffle the cards

Cards are shuffled

One card is picked

One specific suit

Of a particular colour is chosen

The identity is decided

And that decides the game

All actions bound by the rules

the wins and the losses

based on the set hierarchy

each dealt hand

judged

They turn into a pile of cards eventually

of winners and losers

ready for another shuffle