कुचले हुए घास के पत्ते (trampled grass blades)

घास के पत्तों को कुचले जाने की आदत है मेरी खवाइशों की भी कुछ कुछ ऐसी ही आदत है औस की बूँदों ने हर बार सम्भाला है ख़्वाहिशों की मौत को कई बार टाला है ज़मीन से जुड़ा हूँ मैंने कहाँ जाना है कुचलते कदम गुज़ार जाएँगे मेरा तो यहीं ठिकाना है किसकी जुस्तजू हैContinue reading “कुचले हुए घास के पत्ते (trampled grass blades)”

Who does it belong to (कौन है मालिक)

ड्रॉइंग रूम में सजी हर चीज़ जो किसी कारीगर की नायाब कारीगरी थी जिसे मजबूर हो कर बेचा गया था जो कभी दुकान के कोने में धूल से लथपथ अपने गले में अपनी क़ीमत लटकाए बेज़ुबान पड़े थे आज मेरे घर की रौनक़ है मोल दिया है अब वो सब मेरे हैं शायद ये एहसासContinue reading “Who does it belong to (कौन है मालिक)”

I still don’t win

It’s cold and windy My body lays bare The nature pitted against me It’s not even fair I close my eyes And I am still The wind passes me by I feel no chill In this battle with nature I still don’t win Because it’s not out there It’s there within