In between the moments

Who decides,the next momentDoes it wait for meOr do I seek? When do I exitthe pastand enter the presentI wonder? If I do movefrom the pastto the present,what do I traverse? From the pastto the destinationThat is nowWhere do I exist? Does that journeyin betweengo without noticingAs if in a sleep? That state betweenthe thenContinue reading “In between the moments”

ग़लत फ़हमी

ड्रॉइंग रूम में सजी मूरतजो किसी कारीगर कीनायाब कारीगरी थीजिसे मजबूर हो करबेचा था उसनेआज वो मेरी है धूल से लथपथअपने गले परअपनी क़ीमत लटकाएजो कभी दुकान के कोने मेंबेज़ुबान पड़ी थीआज वो मेरी है मोल देकर ख़रीदा हैमालिक बदल गया हैना पूछा इस बेज़ुबान सेना ज़रूरत समझीकिसी और की ज़िंदगी का हिस्सा थीआज वोContinue reading “ग़लत फ़हमी”

Who does it belong to (कौन है मालिक)

ड्रॉइंग रूम में सजी हर चीज़ जो किसी कारीगर की नायाब कारीगरी थी जिसे मजबूर हो कर बेचा गया था जो कभी दुकान के कोने में धूल से लथपथ अपने गले में अपनी क़ीमत लटकाए बेज़ुबान पड़े थे आज मेरे घर की रौनक़ है मोल दिया है अब वो सब मेरे हैं शायद ये एहसासContinue reading “Who does it belong to (कौन है मालिक)”

I still don’t win

It’s cold and windy My body lays bare The nature pitted against me It’s not even fair I close my eyes And I am still The wind passes me by I feel no chill In this battle with nature I still don’t win Because it’s not out there It’s there within